Monday, July 11, 2011

इबारत...

दीवार पे अक्सर दिखती थी वो इबारत
था पढना, पर लेनी थी उनकी इजाज़त
इजाज़त दे, कह डाला मुझसे उन्होंने
कि ना डालना हर दिन, इसकी तुम आदत
आदत तो आदत है पीछा ना छोड़े
इजाज़त दी जिसने, अब वो है कान मरोड़े
समझता में कैसे, वो इबारत नहीं है
रोज़ पढने से भी, आने वाली आफत नहीं है
यही सोचकर कि थी मैंने यह हिमाकत
इबारत में लिखा था एक जुमला पुराना
ना मतलब पता था इसलिए था आना जाना
जब एक दिन किसी ने उसका मतलब समझाया
घर जाके मैंने स्कूल का बस्ता उठाया
विषय की किताबों को झट से हटाया
पिताजी के कमरे से कुछ किताबें लाया
कर दिया पूरी तरह से बस्ते को साफ़...
जमा दिए बदले में उसके लैला-मजनू, शीरी-फरहाद
पिताजी ने चिल्ला के पूछा - "क्या कर रहा है"
खेलने-पढने की उमर में प्रेम प्रसंग कर रहा है
जैसे ही उनके सामने पूरी इबारत पढ़ दी....
पिताजी ने भी माथा पीटकर गहरी सांस भर ली..

"पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया ना कोई
ढाई आकर प्रेम के पढ़े सो पंडित होए"


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