एक बार फिर आज़ादी का दिन आ रहा था
हर ओर चहल पहल का माहोंल छ रहा था
बज रहे थे हर जगह देशभक्ति के गाने
और पार्क में छोटा बछा जोर-जोर से चिल्ला रहा था
"झंडे ले लो एक रुपये में, झंडे ले लो एक रुपये में"
लोग आते थे खरीदते थे कुछ कुछ आगे बाद जाते
थका मांदा 'राजू' झंडे बेच के घर आया
बिके हुए झंडे के पैसो को अपनी मुट्ठी में दबाया
इतने में कानों में 'माँ' की आवाज़ आई
गुस्से में थी डांटने लगी चीखी और चिल्लाई
बोली " इतनी रात कहाँ मर गया था,
खेलने गया था या गली में आवारागर्दी कर रहा था"
राजू चुप-चाप खड़ा डांट सुन रहा था
लेकिन मन ही मन एक नन्हा सा सपना बुन रहा था
जाकर माँ के पास उसने अपनी मुट्ठी को खोला
पैसे माँ को देता हुआ हंसकर वो बोला
"माँ तू कल कहीं काम पर मत जाना
कल तो आज़ादी है ना घर में तू छुट्टी मानना
यह पैसे मैं झंडे बेचकर पाए हैं
कल तू भी आज़ाद रह सके, इसीलिए कमायें हैं"


