Wednesday, July 13, 2011

आज़ादी

एक बार फिर आज़ादी का दिन आ रहा था
हर ओर चहल पहल का माहोंल छ रहा था
बज रहे थे हर जगह देशभक्ति के गाने
और पार्क में छोटा बछा जोर-जोर से चिल्ला रहा था
"झंडे ले लो एक रुपये में, झंडे ले लो एक रुपये में"
लोग आते थे खरीदते थे कुछ कुछ आगे बाद जाते
थका मांदा 'राजू' झंडे बेच के घर आया
बिके हुए झंडे के पैसो को अपनी मुट्ठी में दबाया
इतने में कानों में 'माँ' की आवाज़ आई
गुस्से में थी डांटने लगी चीखी और चिल्लाई
बोली " इतनी रात कहाँ मर गया था, 
खेलने गया था या गली में आवारागर्दी कर रहा था"
राजू चुप-चाप खड़ा डांट सुन रहा था 
लेकिन मन ही मन एक नन्हा सा सपना बुन रहा था
जाकर माँ के पास उसने अपनी मुट्ठी को खोला
पैसे माँ को देता हुआ हंसकर वो बोला
"माँ तू कल कहीं काम पर मत जाना
कल तो आज़ादी है ना घर में तू छुट्टी मानना
यह पैसे मैं झंडे बेचकर पाए हैं
कल तू भी आज़ाद रह सके, इसीलिए कमायें हैं"


Tuesday, July 12, 2011

उलझन

पसंदीदा कमीज़ का रंग धुंधला सा गया लगता है....
सोचता हूँ पहन लूँ, फिर कुछ सोच कर रुक जाता हूँ
एक किताब काफी दिलचस्पी से पढ़ रहा था...
यह जानते हुए भी कि अंत के कुछ पन्ने गायब हैं
सोचता हूँ अंत खुद ही लिख लूँ. लेकिन फिर थम जाता हूँ
खुद से जुड़े सारे सवालों के जवाब जानता हूँ..मगर 
फिर भी खुद को हर दिन नए सवालों में उलझाता हूँ

धुंध

धुंध को खुद से दरकिनार करके, 
चला हूँ वही राह मैं पार करके
ओझल हो आँखों से अँधेरा पुराना, 
हकीकत की रौशनी पे ऐतबार करके
अपेक्षाओं की चादर को हटा दूँ बदन से
चला दूँ मैं कैंची या कहीं रख दूँ बंद करके
तलाश करने के लिए कुछ चीज़ खोनी तो ज़रूरी है
खो देता हूँ कई बार खुद को, अपने लोगों की नज़र में

आत्ममंथन

किसी आदत को बदलने में स्वयं से ही लड़ना होता है, इस दिमागी कुरुक्षेत्र के कीचड में जो रथ का पहिया फंसा है...उसे आपको अर्जुन के तीर को लगने से पहले ही निकालना होगा....

स्वयं की खोज

कस्तूरी हिरण की नाभि में होता है....इस बात से अज्ञात वो इधर-उधर कस्तूरी की खुशबु के पीछे दौड़ता रहता है...और थक जाता है....

Monday, July 11, 2011

इबारत...

दीवार पे अक्सर दिखती थी वो इबारत
था पढना, पर लेनी थी उनकी इजाज़त
इजाज़त दे, कह डाला मुझसे उन्होंने
कि ना डालना हर दिन, इसकी तुम आदत
आदत तो आदत है पीछा ना छोड़े
इजाज़त दी जिसने, अब वो है कान मरोड़े
समझता में कैसे, वो इबारत नहीं है
रोज़ पढने से भी, आने वाली आफत नहीं है
यही सोचकर कि थी मैंने यह हिमाकत
इबारत में लिखा था एक जुमला पुराना
ना मतलब पता था इसलिए था आना जाना
जब एक दिन किसी ने उसका मतलब समझाया
घर जाके मैंने स्कूल का बस्ता उठाया
विषय की किताबों को झट से हटाया
पिताजी के कमरे से कुछ किताबें लाया
कर दिया पूरी तरह से बस्ते को साफ़...
जमा दिए बदले में उसके लैला-मजनू, शीरी-फरहाद
पिताजी ने चिल्ला के पूछा - "क्या कर रहा है"
खेलने-पढने की उमर में प्रेम प्रसंग कर रहा है
जैसे ही उनके सामने पूरी इबारत पढ़ दी....
पिताजी ने भी माथा पीटकर गहरी सांस भर ली..

"पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया ना कोई
ढाई आकर प्रेम के पढ़े सो पंडित होए"


खीज रस...

घडी की तरफ नज़र दौड़ाई  तो देखा …10 बज  चुके  थे ….पूरे दिन क्या करना है, उसके लिए  दिमाग में खाका  तैयार करना था . काफी मशक्कत  के बाद  वह खाका तैयार हो गया.. …खिड़की से बाहर झाँक कर देखा  तो ऐसा लगा  7 ही बजा है... दुबारा घडी की तरफ देखा...कुछ देर देखता रहा....पता चला घडी बंद है....  मोबाइल पे टाइम देखा तो 7  ही बजे थे … दिमाग में बने खाके को,  इन  3 घंटो ने झिंझोड़ दिया...अब कोशिश कर रहा था, इन तीन घंटों को पुराने तैयार खाके में किस तरफ फिट करूँ....वैसे भी सामने फिर से एक पूरा लम्बा दिन मुंह बाये खड़ा था..और ऊपर से bonus  में मिले इन तीन घंटों ने, उस दिन की उम्र कुछ और लम्बी कर दी थी ...जिसकी सजा मुझे भुगतनी थी …सोचा …इन 3 घंटों  को खाके में ना फिट करके, अलग खर्च करता  हूँ …कुछ ऐसा काम जो तयेशुदा ना हो... कुछ creative...Creative..यह शब्द इतनी बार मुझे अपने  आसपास सुनने मिलता था कि मेरी भी  इच्छा थी कि कभी इससे अपने साथ रखूं...ना सही permanently ... कुछ समय के लिए मेरे साथ रह ले बस... अब 3 bonus घंटो में creativity की याद आ गई …फिर  क्या था ...मोबाइल  पे  3 घंटे बाद का अलार्म सेट किया...…फिर  घर के चारों ओर नज़र दौड़ाई . किताबों की अलमारी को खिसकाकर दीवार के दूसरे कोने में ले गया, …shoe rack को दरवाज़े के दाई तरफ से बाएं तरफ रख दिया....बिस्तर को किताबों की पुरानी जगह..इसी  तरह  …कुछ और चीज़ों  को एक कोने से दुसरे कोने पर...इस पूरे फैरोबदल के बाद घर काफी Creative लगा...(मेरे नज़रिए से ) टाइम देखा तो पता चला अभी १.३० घंटा ही बीता है ..इतना ही समय ओर बचा है....एक बार फिर शरीर की धीर सारी नसों में से दिमाग को जाने वाली नस ने  तेज़ी से काम करना शुरू कर दिया  …चाय बनाई , जो चाय  5 मिनट में बनती थी, उसे १० मिनट  तक खोलाया .., ५ मिनट .सिगरेट ने ले लिए...पेपर ओर पेन लेकर कहानी लिखने का सोचा …कहानी तो लिखी नहीं गई सोच- विचार में  आधा घंटा चला गया...इस सारे कर्मकांड में  Creativity पीछे छुट गई …( जो मुझे लग रहा था पहले साथ में थी )...फिर अपना पुराना फोटो एल्बम खोलकर बैठ गया... फ़िल्मी तरीके से....पुरानी  black & white फोटो को देखकर पूरे चारे में वीर, शांत, हास्य, अदभूत रस कुछ-कुछ के लिए आते-जाते... मेरी इस आत्ममुग्धता को मोबाइल के अलार्म ने तोडा …ओर एक ख़ुशी मेरे चेहरे पर दौड़ गई की  bonus 3 घंटो  को मैंने अच्छी से utilise किया था...10 बज चुके थे..तभी दूसरी तरफ ख़याल दिमाग में कौंधा की...3  घंटे तो बीत गए... पर  अबी जी पूरा दिन बचा है उसको कैसे  utilise किया जाए...ओर फिर एक ही रस मेरे चहरे पे छा गया...खीज रस.....